दीवानी मुकदमा या सिविल केस कैसे किया जाता है...?
काम करने के अपने अपने तरीके होते हैं, किसी भी काम को अगर ठीक तरीके से किया जाए तो, उस काम के सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती है, अगर ठीक प्रोसीजर से कोई काम किया जाए तो आधी समस्याएं तो वैसे ही सुलझ जातीं है...! कोर्ट के मामलों में काम अपनी एक प्रक्रिया से होता है... प्रक्रिया पर ही निर्भर है कि बात किस स्तर तक जा सकती है, प्रक्रिया अगर ठीक है तो आप बिना समस्याओं का सामना किए... अपनी मंजिल पा सकते हैं...!
आज हम सिविल केस यानी दीवानी मुकदमा दायर कैसे किया जाए, उसके विषय में जानेंगे...!
Civil Case या दीवानी मुकदमा
ऐसी स्थिति में किया जाता है, जब हमारा उद्देश्य अपना अधिकार प्राप्त करने का हो, ऐसे मामलों में जेल नहीं होती... इनमें तलाकशुदा महिला को अपना गुजारा भत्ता प्राप्त करना हो, किसी पर मानहानि का मुकदमा करके हर्जाना लेना हो... आदि मामले आते हैं, इनका उद्देश्य जेल भिजवाना नहीं होता...
Civil Case या दीवानी मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है, कोर्ट का प्रोसीजर फॉलो करना... प्रोसीजर का पालन नहीं होने की स्थिति में कोर्ट परिवाद एक्सेप्ट ही नहीं करेगा...!
प्रोसीजर
सबसे पहले तो आपको आपने मामले की कॉपी टाइप करवानी होगी, उसमे जिसपर परिवाद दायर किया जा रहा है, उसका नाम, पता आदि पूरा विवरण देना होगा... लिमिटेशन एक्ट 1963 के अंतर्गत ऐसे मामलों में 6 महीने के अंदर अंदर मामला दायर हो जाना चाहिए. जैसे संपति पर कब्जे के मामले में...!
जो सिविल मुकदमा या दीवानी मुकदमा दायर कर रहा है, उसे वादी नाम से संबोधित किया जाता है, और जिसके ऊपर मुकदमा दायर किया जा रहा है, उसे प्रतिवादी नाम से संबोधित किया जाता है.
दोनों पार्टियों का नाम, पता, जिस कोर्ट में किया जा रहा है उसका नाम... शपथ पत्र, जितने आरोप लगाए गए हैं, उन सबके शपथ पत्र.. संलग्न होने चाहिए, तभी कोर्ट केस स्वीकार करेगा...!
वकालत नामा
सबसे महत्वपूर्ण चीज ऐसे मामलों में वकालत नामा ही होती हैं, क्योंकि बहुत कम लोग अपनी पैरवी खुद कर पाते हैं... ऐसे में एक वकील की जरूरत होती है, उसके लिए कोर्ट में वादी द्वारा एक वकालत नामा पेश करना पड़ेगा, जिसमें ये बातें दर्ज होनी चाहिए...
- जिसमें वादी यानी, जो मुकदमा कर रहा है, वो इस मामले में किसी भी प्रकार के फैसले में वकील को जिम्मेदार नहीं ठहराएगा.
- इस परिवाद या मुकदमे का सम्पूर्ण खर्चा खुद वहन करेगा.
- फीस का भुगतान नहीं होने तक वकील मुकदमे से संबंधित सभी कागजात अपने पास रख सकता है.
- वकील को कोर्ट में अपने मुवक्किल के हक में फैसला लेने का पूरा अधिकार होगा.
- वकील को कोर्ट में अपने मुवक्किल के हक में फैसला लेने का पूरा अधिकार होगा.
वकालत नामा तैयार करवाने की कोई फीस नहीं होती है, सिर्फ कागजात और स्टांप आदि का खर्चा लिया जाएगा..!
इन सबके बाद आपक मामला कोर्ट में पेश किया जाएगा, पहली सुनवाई में कोर्ट को लगेगा कि मामला सही और सच है तो ही लिया जाएगा नहीं तो उसी दिन खारिज किया जा सकता है...! दीवानी मुकदमे में वादी को कोर्ट कार्यवाही की पूरी फीस जमा करवानी होती है...!
अदालती कार्रवाई
सुनवाई में कोर्ट को ये लगता है कि मामले में सच्चाई है तो एक तय तारीख तक प्रतिवादी को कोर्ट में हाजिर होने के लिए नोटिस भेजेगा... ये नोटिस प्रतिवादी को उसका पक्ष रखने के लिए भेजा जाएगा...!
1.नोटिस भेजे जाने से पहले वादी को अदालती कार्रवाई के लिए एक तय शुल्क भुगतान करना होगा और...
2. जिसके खिलाफ केस किया गया है उसके लिए वादी को अपने मामले की दो कॉपी जमा करवानी पड़ेगी... प्रतिवादी पार्टी में जितने आदमी है, उनके हिसाब से प्रति आदमी दो कॉपी जमा करवानी होगी. यानी प्रतिवादी पार्टी में 5 आदमी है तो 10 कॉपी कोर्ट में जमा करवानी होती है...! क्योंकि एक कॉपी कोर्ट में जमा होती है और दूसरी प्रतिवादी को डाक द्वारा भेजी जाती है, इसलिए दो कॉपी की जरूरत होती है...!
लिखित बयान
प्रतिवादी को अपने खिलाफ दर्ज मामले में लिखित बयान दर्ज करवाने के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है, प्रतिवादी चाहे तो इसमें 90 दिन तक आगे बढ़वा सकता है.. लिखित बयान में प्रतिवादी किसी विशेष आरोप को नकारता नहीं है तो इसका अर्थ है कि प्रतिवादी को आरोप स्वीकार है...! लिखित बयान में प्रतिवादी का शपथ पत्र भी आवश्यक है...!
वादी की प्रतिकृति
प्रतिवादी द्वारा शपथ पत्र में लिखी गई बातों या आरोपों से इंकार करना होता है, अगर आरोपों से इंकार नहीं किया जाता है तो, ये समझ लिया जाता है कि प्रतिवादी के लगाए गए आरोप सही है...! इसमें भी शपथ पत्र संलग्न होना चाहिए.
एक बार वादी की प्रतिकृति या Replication of plaintiff दर्ज हो जाने की स्थिति में आपका परिवाद या याचिका पूरी हो जाती है...! अब आगे सुनवाई शुरू हो जाती है...!
परिवाद से संबंधित कागजात को जमा करवाना
दोनों पार्टियों को अपने आप को साबित करने के लिए सबूतों के तौर पर कागजात जमा करवाने का मौका दिया जाता है...! एक बार कागजात जमा हो जाने के बाद वो कागजात कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाते हैं... अंतिम सुनवाई में किसी भी डॉक्यूमेंट को मान्यता नहीं दी जाती...! इसलिए सभी कागजात पहले ही जमा करवा दिए जाने चाहिए...!
मुद्दों का निर्धारण
इन सबके बाद कोर्ट उन मुद्दों का निर्धारण करती है, इस मामले में दोनो पार्टियां इन मुद्दों से बाहर नहीं जा सकती...! ये मुद्दे कानूनी या इस मामले से संइन्हीं मुद्दों के आधार पर बहस और गवाहों से जिरह होती है...! ये मुद्दे कानूनी या इस मामले से संबंधित हो सकते हैं...! दोनों पार्टियों को इन्हीं मुद्दों के भीतर रहना होता है...! इन्हीं मुद्दों के आधार पर बहस और गवाहों से जिरह होती है...! अंतिम आदेश देने से पहले कोर्ट प्रत्येक मुद्दे पर अलग अलग विचार करती है...! और फैसला भी प्रत्येक मुद्दे पर अलग हो सकता है...!
गवाहों की लिस्ट
दोनों पार्टियों के गवाहों की लिस्ट बनवाई जाती हैं, जो इस मामले में महत्वपूर्ण होते हैं...! मुकदमा दायर करने के दो सप्ताह या कोर्ट द्वारा निर्धारित समय तक दोनों पार्टियों को गवाहों की लिस्ट जमा करवानी होती है..?गवाहों को कोर्ट द्वारा सम्मन भेजा जाता है या पार्टियां अपने स्तर पर गवाहों को बुला सकती है, किसी भी स्थिति में गवाहों को बुलाने का खर्च पार्टियों द्वारा ही वहन किया जाता है...! सबसे अंत में गवाहों से पूछताछ होती है, जिसमें दोनों पार्टियों के वकील पूछताछ करते हैं... पूछताछ पूरी हो जाने के बाद कोर्ट अपना फैसला देती है...! सारी सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला देने के लिए कोर्ट एक तारीख तय करती है...! अंतिम सुनवाई में दोनों पार्टियां अपनी अपनी याचिकाओं में संशोधन कर सकती है...!
आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि
अदालत का अंतिम फैसला आने के बाद आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि लेने के लिए कोर्ट के रजिस्ट्री कार्यालय में एक फीस जमा करवाकर ली जा सकती है...! आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि भविष्य में वादी या प्रतिवादी के लिए बहुत जरूरी दस्तावेज होती है...!
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