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गन का लाइसेंस लेने का क्या प्रोसेस है ?

 गन का लाइसेंस लेने का क्या प्रोसेस है ?     आत्म रक्षा या खुद के परिवार और अपनी संपति की सुरक्षा का अधिकार सभी को है, आत्म रक्षा के लिए कानून भी व्यक्ति को हत्या तक के मामले में राहत देता है... व्यक्ति को अपनी संपत्ति अपने परिवार और स्वयं की सुरक्षा पर खतरा महसूस होता है, तब उसकी रक्षा प्रशासन या समाज करता है... लेकिन हर समय प्रशासन और समाज साथ नहीं रहते, उसके लिए व्यक्ति को खुद ही अपनी सुरक्षा करनी होती है... स्वयं, परिवार और संपति की सुरक्षा के लिए किसी हथियार की जरूरत होती है, लेकिन कोई भी धारदार हथियार या गन या किसी भी प्रकार का खतरनाक हथियार रखना कानून की नजर में जुर्म होता है... धारदार हथियार के अलावा प्रशासन गन रखने की अनुमति देता है, लेकिन उसके लिए हमें एक मजबूत कारण बताना पड़ता है... प्रशासन को बताना पड़ता है कि... हथियार की जरूरत क्यों है...?  तो आज के इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि गन का लाइसेंस किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है...?  गन का लाइसेंस लेना मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं है...          जरूरी दस्तावेज पहचान पत्र (आ...

पॉवर ऑफ अटॉर्नी

 पॉवर ऑफ अटॉर्नी       कई बार हमें कुछ कामों की जरूरत पड़ती है और हम उन्हें कर पाने में सक्षम नहीं होते या अपना काम छोड़कर वह काम करना नहीं चाहते... या हम बीमार होते हैं और हमारे काम रुक जाते हैं तो... ऐसी स्थिति में हम अपने आप को असहाय महसूस करते हैं... ऐसा ही मामलों में काम आती है पावर ऑफ अटॉर्नी...  पावर ऑफ अटॉर्नी होती क्या है...? पावर ऑफ अटॉर्नी एक्ट 1882 के अनुसार एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अपना लीगल प्रतिनिधि नियुक्त करता है...!  जो घोषित करता है वो प्रिंसिपल कहलाता है और जो जिसको घोषित किया जाता है उसे एजेंट कहा जाता है...! एजेंट प्रिंसिपल के स्थान पर ज्यूडिशियल, फाइनेंशियल और अन्य फैसले ले सकता है... प्रिंसिपल के स्थान पर कोई डीड आदि साइन कर सकता है... ये सब कानूनन वैध होते हैं...! एजेंट पावर ऑफ अटॉर्नी के दायरे से बाहर नहीं जा सकता, यानी किसी मामले में मनमानी नहीं कर सकता... अगर एजेंट की वजह से प्रिंसिपल को कोई नुकसान हो जाता है तो उसकी भरपाई एजेंट ही करेगा, ये भी प्रावधान है...!  पावर ऑफ अटॉर्नी कैसे...

स्टे ऑर्डर कैसे लिया जाता है ?

स्टे ऑर्डर कैसे लिया जाता है ?    जीवन की अधिकतर समस्याएं बिना जानकारी के होती हैं, किसी भी बात की ठीक ठाक जानकारी हमें परेशानी में पड़ने से रोक सकती है... हर बात खुद के अनुभव से सीखी नहीं जाती, कई जानकारियां ऐसी होती हैं, जिनको किसी अन्य के अनुभव से ही सीखा जाना चाहिए... खुद के अनुभव से हम कोई काम निपटा नहीं सकते... व्यक्ति को हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए... कई शोध इस बात का दावा करते हैं कि हमेशा कुछ न कुछ नया करते रहने वाला व्यति ज्यादा उम्र पाता है... आज हम स्टे ऑर्डर पर जानकारी देंगे... जो भविष्य में आपके बहुत काम आ सकती है...! स्टे ऑर्डर होता क्या है...? जब कोई विरोधी पक्ष का व्यक्ति या पार्टी हमारे हितों के प्रतिकूल कोई कार्य करता है और उसको रोकने के लिए हमें प्रशासन की जरूरत होती है, प्रशासन का उस मामले में हस्तक्षेप सिविल कोर्ट के आदेश से ही संभव है... सिविल कोर्ट से उस कार्य को रूकवाने के लिए हमें कोर्ट के सामने एक एप्लीकेशन प्रस्तुत करनी होती है, जिसमें निवेदन करना होता कि विरोधी पक्ष हमारे हितों के विपरीत कार्य कर रहा है, जिसे रोकने के लिए स्टे ऑर्डर यानी निषेध...

चेक बाउंस होने पर क्या कर सकते हैं...?

चेक बाउंस होने पर क्या कर सकते हैं...?     आदमी को सबसे ज्यादा डर अगर किसी बात का है, तो वो है धोखा... मौत से अधिक डर व्यक्ति को धोखे से लगता है... धोखा मानसिक हो सकता है, आर्थिक मामले में हो सकता है... कई बार तो धोखा शारीरिक नुकसान भी पहुंचा देता है... इन सबसे बचने के लिए व्यक्ति को समाज के विषय में अपडेट रहना चाहिए...!  व्यक्ति को चाहिए कि अपने आस पास के माहौल को ठीक से समझ लें... ताकि आम जन की मानसिक स्थिति को लेकर कोई कोई कन्फ्यूजन नहीं रहे...!  आर्थिक मामलों में सबसे अधिक धोखे होते हैं, इनमें चेक से संबंधित धोखा सबसे ज्यादा होता है...! एक बार विश्वास करके चेक स्वीकार कर लिया जाए तो हम धोखा खाने से बच नहीं सकते हैं... हमें चेक लेते समय ये पता नहीं होता है कि चेक देने वाले के खाते में पैसे है भी या नहीं...? अगर चेक बाउंस हो जाए तो हमारे पास क्या क्या उपाय है, उसी पर हम आज जानेंगे...! चेक बाउंस होता कैसे है...? मान लीजिए आपको किसी ने किसी पेमेंट के बदले चेक काट कर दिया, आप उस चेक को बैंक में कैश करवाने या अपने खाते में पैसे डलवाने गए, जिसने चेक जारी किया है उसके खा...

उम्र कैद की सजा वास्तव में कितने साल की होती है...?

उम्र कैद की सजा वास्तव में कितने साल की होती है...?    जब कोई भ्रांति फैल जाती है तो वो बड़े व्यापक स्तर पर फैलती है... उसका जनमानस पर बहुत गहरा असर पड़ता है... गलत और तथ्यहीन बात बहुत जल्द फैल जाती है, ऐसे बातें लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है... फिर चाहे लाख कोशिश क्यों ना कर लीजिए... लोग गलत को ही सच मानेंगे...! ऐसी ही भ्रांति भारत में उम्रकैद की सजा को लेकर फैली हुई है... आम धारणा है कि उम्रकैद की सजा 14 साल ही होती है... जबकि ऐसा नहीं है..! मारू राम वर्सेज भारत सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों के वकीलों की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उम्रकैद का मतलब मुजरिम को पूरी जिंदगी जेल में ही बितानी पड़ेगी... संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि उम्रकैद की सजा 14 साल है... उम्रकैद का मतलब जीवन भर जेल में ही रहना होगा... मारूराम और उसके साथी 1981 से हत्या के मामले में जेल में बंद हैं, और उनके वकीलों ने उनकी जेल में बिताई गई 14 वर्ष की अवधि के बाद उनको रिहा करने के लिए एक याचिका दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया...! IPC के सेक्शन 45 में ये उल्लेख किया ...

दीवानी मुकदमा या सिविल केस कैसे किया जाता है...?

दीवानी मुकदमा या सिविल केस कैसे किया जाता है...?        काम करने के अपने अपने तरीके होते हैं, किसी भी काम को अगर ठीक तरीके से किया जाए तो, उस काम के सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती है, अगर ठीक प्रोसीजर से कोई काम किया जाए तो आधी समस्याएं तो वैसे ही सुलझ जातीं है...! कोर्ट के मामलों में काम अपनी एक प्रक्रिया से होता है... प्रक्रिया पर ही निर्भर है कि बात किस स्तर तक जा सकती है, प्रक्रिया अगर ठीक है तो आप बिना समस्याओं का सामना किए... अपनी मंजिल पा सकते हैं...!  आज हम सिविल केस यानी दीवानी मुकदमा दायर कैसे किया जाए, उसके विषय में जानेंगे...! Civil Case या दीवानी मुकदमा   ऐसी स्थिति में किया जाता है, जब हमारा उद्देश्य अपना अधिकार प्राप्त करने का हो, ऐसे मामलों में जेल नहीं होती... इनमें तलाकशुदा महिला को अपना गुजारा भत्ता प्राप्त करना हो, किसी पर मानहानि का मुकदमा करके हर्जाना लेना हो... आदि मामले आते हैं, इनका उद्देश्य जेल भिजवाना नहीं होता...  Civil Case या दीवानी मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है, कोर्ट का प्रोसीजर फॉलो करना... प्रोसीजर का पाल...

वसीयत

वसीयत           भविष्य में आने वाली अधिकतर समस्याओं को हम अपनी सूझ बूझ से टाल सकते हैं... जिस परिवार में जितनी कम समस्या आयेगी... वो परिवार उतना ही अधिक उन्नति करेगा... समस्याओं से घिरा परिवार और उस परिवार के सदस्य कभी उन्नति नहीं कर सकते...!    समस्याओं से घिरा परिवार हमेशा सबसे पीछे ही रहता है... ना बच्चे पढ़ पाते हैं, ना उनको उचित संस्कार मिल पाते हैं... इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि आप समाज में चल रही समस्याओं को पर नजर रखे, उनका विश्लेषण करते रहें... और उस अनुभव के आधार पर आप अपने परिवार के भविष्य में आने वाली समस्याओं से बच सकते हैं... अगर आपका परिवार बहुत बड़ा है, तो समस्याएं भी ज्यादा आने वाली हैं...! ज्यादातर समस्याएं संपत्ति को लेकर होती हैं... संपत्ति का बंटवारा ठीक से नहीं हुआ है, तो समस्याओं का अंबार लग जाता है, इस समस्या से परिवार टूट जाता है... इसको टालने के लिए आपको अपनी संपत्ति को लेकर समय पर वसीयत तैयार करवा लेनी चाहिए...!  वसीयत वसीयत स्टांप या सादे कागज पर करवाई जा सकती है... दोनों की मान्यता बराबर है... विवाद ना हो इसलिए...

किरायेदार से अपनी दुकान या अपना मकान कैसे खाली करवा सकते हैं...?

किरायेदार से अपनी दुकान या अपना मकान कैसे खाली करवा सकते हैं...?        एक परिवार या व्यक्ति के लिए आजीविका जीवन का आधार होती है... आजीविका का अर्थ है... आय का श्रोत, जहां से आपके घर में धन आता है, जिससे आप अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं... ये सरकारी नौकरी या खुद का व्यवसाय हो सकता है... कोई बेरोजगार होता है या आजीविका का स्थाई साधन नहीं होता, ऐसी स्थिति में धन की आवश्यकता रहती है, लेकिन आजीविका स्थाई नहीं होती... तब हमारे पास अपनी संपति होती है... जिसे या तो हम बेच सकते हैं या फिर उसे रेंट यानी किराए पर दे सकते हैं... किराए पर देने का विकल्प सबसे बेहतर होता है... इसमें किसी जरूरतमंद को रहने के लिए घर मिल सकता है या आपके पास कोई दुकान है तो अपनी दुकान चला सकता है... उसकी रहने या व्यवसाय की आवश्यकता पूरी हो जाती है, और उसके माध्यम से आपको धन  की...  लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हम अपना घर या दुकान विश्वास करके किराए पर दे तो देते हैं लेकिन उस संपति को हमारे जरूरत पड़ने पर किरायेदार खाली करनें से मना कर देता है... या फिर दुर्व्यवहार करने पर उतारू हो जाता है....

संपति पर अवैध कब्जा हो जाने पर कैसे खाली करवाएं...?

संपति पर अवैध कब्जा हो जाने पर कैसे खाली करवाएं...?      समस्याएंं जीवन का हिस्सा हैं, आती रहती है... एक समस्या का निदान हुआ नहीं कि दूसरी समस्या उपस्थित हो जाती है... दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिंदगी का दूसरा नाम ही समस्या है... व्यक्ति अपने अनुभवों से ही सीखता है... ज्यादा अनुभवी व्यक्ति के पास ज्यादा समस्याओं का समाधान होता है... जैसे जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, वैसे ही उसे जीवन का अधिक अनुभव होता जाता है... ज्यादा उम्रदराज व्यक्ति मतलब ज्यादा समझदार और अनुभव... अनुभव ही व्यक्ति की जीवन भर की संपति होती है...  व्यक्ति के पास संपति है लेकिन अनुभव नहीं है तो संपति ज्यादा समय तक नहीं टिकेगी...! शायद हम अपने से उम्र में बड़े या बुजुर्गों का इसी लिए सम्मान करते हैं, क्योंकि उनके पास हमसे ज्यादा अनुभव है, वे हमसे ज्यादा समझदार हैं... वो किसी भी समस्या का हमसे जल्दी समाधान निकाल सकते हैं, उनकी किसी सलाह से जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है...! अपने से अनुभवी व्यक्ति का हमेशा सम्मान करना चाहिए, ताकि हम उनके सानिध्य में रहकर उनके अनुभव से सीख सकें...! हम...

झूठी FIR होने पर क्या करें ?

झूठी FIR होने पर क्या करें ?       कानून लोगों की भलाई के लिए बनाए गए हैं, ताकि लोग देश में शांति से जीवन यापन कर सकें, कोई उन्हें बेवजह परेशान ना करे... कानून के भय से लोग अपने दायरे में रहेंगे तो अव्यवस्था नही फैल पाएगी... कानून की पालना के लिए देश में एक पूरा सिस्टम बना हुआ है... सरकार से लेकर कोर्ट तक और कोर्ट से लेकर पुलिस तक... ताकि आमजन को किसी प्रकार की परेशानी नहीं हो... लेकिन कभी कभी लोग दुर्भावना से किसी के ऊपर कोई झूठा परिवाद यानी केस दर्ज करवा देते हैं... पुलिस और केस दर्ज करवाने वाले को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जिसके ऊपर केस दर्ज होता है, उसकी पूरी जिंदगी खराब होने की संभावना होती है... केस में उलझने के बाद व्यक्ति ना काम कर पाता है और ना ही अपने घर को संभाल पाता है... इस तरह के झूठे परिवाद या केस से निपटारा पाने के लिए भी व्यवस्था की गई है... लेकिन हम जानकारी के अभाव में परेशान होते रहते हैं... झूठे केस या परिवाद या मुकदमे को किस तरह रद्द करवाया जा सकता है... आज उसी पर ये लेख है... झूठी एफआईआर या मुकदमा      पिछले लेख में बताया था कि क...