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उपभोक्ता मामलों में शिकायत कैसे करें ?

उपभोक्ता मामलों में शिकायत कैसे करें ?        परेशानियां जीवन का हिसा होती हैं, जीवन में परेशानियों का भी उतना अस्तित्व है, सांसों का... जीवन को सही और संतुलित तरीके से किया जाए तो हम बहुत सी मुसीबतों में पड़ने से बच सकते हैं... लेकिन कई बार लाख सावधानी के बाद भी हम समस्या में पड़ ही जाते हैं... ऐसे में हम अपने या दूसरों के अनुभव से परेशानी से बचकर निकल सकते हैं... या उस परेशानी की वजह से हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं या अपनी समझदारी से किसी भी गलत इंसान या संघठन को सबक सीखा सकते हैं... बाजारवाद के इस युग में हम ठगी से नहीं बच सकते... क्योंकि जरूरत का सामान खरीदना ही होगा, ऐसे में कंपनियां या दुकानदार किसी न किसी रूप में उपभोक्ता यानी कंज्यूमर से बदमाशी किए बिना नहीं रहेगी... आज हम इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि कंपनी या दुकानदार से हुई ठगी का मुहावजा या उसे सबक कैसे सीखा सकते हैं...!  सबसे पहले कुछ सामान्य बातों को समझ लेते हैं, जैसे हम लोग बाजार से या ऑनलाइन प्लेटफार्म से कुछ ना कुछ खरीदते ही रहते हैं... जैसे ही हम कोई वस्तु कहीं से खरीदते हैं, हम ग्राहक...

कॉपीराइट कानून क्या है ?

कॉपीराइट कानून क्या है ?       मेहनत कोई और करे और उसका लाभ किसी और को मिले... ऐसे मामले में मेहनत करने वाले के साथ अन्याय होता है, जिसको या तो समाज न्याय करता है या फिर उस देश का कानून... मेहनत कई प्रकार की होती है, शारीरिक मेहनत को आम जीवन में ज्यादा तवज्जो दी जाती है, लेकिन उस मेहनत की भूमिका वास्तव में व्यक्ति के मस्तिष्क में तैयार होती है... मेहनत का परिणाम कोई निर्माण हो सकता है, कोई संगीत हो सकता है, कोई पुस्तक हो सकती है... या फिर कोई अविष्कार हो सकता है... ऐसी चीजों होने वाली आय पर पहला अधिकार उनके रचनाकार का होता है... अगर कोई रचनाकार की सहमति के बिना उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करता है तो ये एक प्रकार का क्राइम होता है... इस क्राइम को रोकने के लिए ही कॉपीराइट कानून बनाया गया है...     आज हम भारत और विश्व में कॉपीराइट कानून के विषय में जानेंगे...    कॉपीराइट कानून के विषय में इस प्रकार समझा जा सकता है... जब भी कोई व्यक्ति अपने दिमाग में आए विचार को किसी अनोखी रचना का रूप देता है, ऐसी खोज करने से वह व्यक्ति रचनाकार या खोजकर्ता या उसका...

धार्मिक भावनाएं आहत होने पर किस कानून के अनुसार केस फाइल करना चाहिए ?

 धार्मिक भावनाएं आहत होने पर किस कानून के अनुसार केस फाइल करना चाहिए ?         कुछ लोगों का काम होता है, किसी पर भी बिना मतलब के कीचड़ उछालना... किसी एक की गलती के लिए लाखों लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना... गलती किसी की भी क्यों ना हो, परिवार और उसके धर्म और मान्यताओं को बीच में नहीं लाना चाहिए... कई लोग अपने निजी हित के लिए किसी भी धर्म या देवी देवताओं पर या उनके चरित्र पर बिना कुछ विचार किए कुछ भी बोल देते हैं... इस तरह की बातों से लाखों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचती है... ये बहुत गलत है, इन्हें देश हित में रोका जाना चाहिए... आज इसी बिंदु पर ये ब्लॉग है...   किसी की धार्मिक भावनाएं को चोट पहुंचाने पर क्या कानून है...?    धर्म या मजहब या रिलीजन ये सब अलग अलग भाषाओं के शब्द है... इनका शाब्दिक अर्थ समान है...! कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह से किसी की मान्यताओं का गलत अर्थ प्रस्तुत करता है, या गलत व्याख्या करता है, या देवी देवताओं को गाली देता है, उनके चरित्र पर झूठे लांछन लगाता है... या किसी के धर्म के विषय में अपशब्द कहता है... या किसी ...

साइबर क्राइम यानी ऑनलाइन ठगी की कंप्लेन कैसे करें ?

साइबर क्राइम यानी ऑनलाइन ठगी की कंप्लेन कैसे करें ?    पुराने समय में डकैत रात के समय में आते थे और सबकुछ चुराकर निकल जाते थे, मुंह पर कपड़ा बांधे ये डकैत गांव के गांव लूटकर जंगलों में भाग जाते थे, जिनको पकड़ने के लिए पुलिस भटकती रहती थी, लेकिन बहुत कम मामलों में पुलिस सफल हो पाती थी... ज्यादा पकड़ में नहीं आते थे तो उनपर इनाम रखा जाता था, ताकि कोई इनाम के लिए उन डकैतों की सूचना पुलिस को दे और उन्हें पकड़कर उनके किए की सजा दी जा सके... फिर देश आजाद हुआ और डकैतों ने नए तरीकों से लूटपाट करनी शुरू कर दी, यानी डकैत नेता बन गए और पुलिस को अपने नियंत्रण में ले लिया... फिर समय बदला और डकैत समाज ने पढ़ाई लिखाई शुरू की और आधुनिक तरीके से डकैती डालनी शुरू कर दी, आधुनिक डकैत अपने घर में बैठे बैठे ही डकैती करने लगे... ये डकैत इतने तेज हैं कि चाहें तो एक मिनट में कहीं भी बैठकर बैंक के बैंक लूट सकते हैं... कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता इनका... किसी का धन लूटना तो इनके लिए बाएं हाथ का खेल है... ये आधुनिक डकैत अपने काम को अंजाम अपने मोबाइल या कंप्यूटर से देते हैं... और किसी को कानों कान पता नहीं च...

जमानत

 जमानत      मित्र रिश्तेदार आदि के सुख दुःख में साथ रहना ही वास्तविक रिश्ता होता है... जो रिश्तेदार मुसीबत में अपने रिश्तेदार के किसी काम ना आए, वो रिश्तेदार कहलाने का अधिकार नहीं है... जो मित्र अपने मित्र की किसी मुसीबत में साथ नहीं दे, ऐसा मित्र ना हो तो ही अच्छा है... लेकिन कई बार रिश्तेदार या मित्र हमारी भावना का दोहन करके हमारा मिसयूज कर लेते हैं... इसलिए मित्रता या रिश्तेदारी थोड़ी सावधानी से निभाई जानी चाहिए... नहीं तो बड़ी मुसीबत में पड़ने में समय नहीं लगता है... आज हम जमानत के बारे में जानेंगे... कि अगर हम किसी की जमानत दे देते हैं या जमानती बन जाते हैं और अगला जमानत पर छूटने के बाद हमारी बात नहीं मानता है और तारीख पर कोर्ट में हाजिर नहीं होता तो हम किस प्रकार की परेशानी में पड़ सकते हैं...       जमानत अग्रिम जमानत रेगुलर जमानत 1. कई मामलों में आरोपी की जमानत गिरफ्तार होने से पहले ही ले ली जाती है, इस तरह की जमानत अग्रिम जमानत कहलाती है. इस तरह की जमानत मारपीट, धमकी, लापरवाही से वाहन चलाना, लापरवाही से वाहन चलाते हुए किसी को जान से मार देना आद...

जनहित याचिका

 जनहित याचिका     आस पास हो रहे घटनाक्रम और कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिनपर हमें ध्यान देना चाहिए... कई बार कुछ आसान शब्दों को हम सुनते रहते हैं, जिनका संबंध सीधा हमसे ही होता है... जैसे पब्लिक मीटिंग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट, पब्लिक पार्क, या पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन... जिनका संबध आम आदमी से यानी हमसे होता है... लेकिन हम इन घिसे पिटे शब्दों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेते... जबकि ये शब्द या संस्थाएं हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है... इनसे हमारे हित जुड़े हुए होते हैं... आमजन की बड़ी बड़ी समस्याएं हम सुलझा सकते हैं, अगर ठीक से आंख, कान खुले रखें तो... हमारी समस्याओं को सुलझाने के लिए ही पीआईएल या जनहित याचिका कोर्ट में लगाई जाती है... ये याचिका आमजन की तरफ से, सरकार के  या सरकार की किसी घटक या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त संस्था के खिलाफ लगाई जाती है... किसी समस्या का सामना जब आम आदमी बार बार करता है और सरकार ज्ञापन देने के बावजूद भी उस समस्या के निवारण पर कोई कार्यवाही नहीं करती है, तब अपनी समस्या को लेकर न्यायालय की शरण में जाने का ही रास्ता बचता है... आज हम जनहित याचिक...

वकीलों का कोट काला ही क्यों...?

वकीलों का कोट काला ही क्यों...?   किसी भी व्यक्ति या संस्था या किसी खास जगह की अपनी एक पहचान होती है... पहचान आवाज की हो सकती है... पहचान किसी खास सुगंध की हो सकती है... पहचान रंग की हो सकती है... प्रत्येक चीज की अपनी एक पहचान होती है... यानी पहचान ही सब कुछ है... पालतू जानवर भी किसी खास वजह से लोगों या अपने मालिक को पहचानते हैं...! अपनी पहचान जिस किसी भी वजह से है उसे खोना नहीं चाहिए... पहचान खो जाने से सब कुछ खो जाता है...  जैसे हम खाली रंग देखते ही समझ जाते हैं पुलिस है... या किसी को सफेद कोट में देखते हैं तो पहचान जाते हैं कि कोई डॉक्टर है... उसी प्रकार किसी को काले कोट में देखते ही पहचान जाते हैं कि कोई वकील है... तो आज हम इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि वकीलों के कोट का रंग काला ही क्यों होता है...     काला रंग शक्ति और अधिकार को दर्शाता है, तथा भारतीय संस्कृति में काले रंग को न्याय के देवता शनि का रंग माना गया है, क्योंकि शनि का रंग भी काला है...! इतिहास      1685 में ब्रिटेन के राजा की मौत के बाद वहां के लोगों और वकीलों ने राजा की मृत्यु का ...

गन का लाइसेंस लेने का क्या प्रोसेस है ?

 गन का लाइसेंस लेने का क्या प्रोसेस है ?     आत्म रक्षा या खुद के परिवार और अपनी संपति की सुरक्षा का अधिकार सभी को है, आत्म रक्षा के लिए कानून भी व्यक्ति को हत्या तक के मामले में राहत देता है... व्यक्ति को अपनी संपत्ति अपने परिवार और स्वयं की सुरक्षा पर खतरा महसूस होता है, तब उसकी रक्षा प्रशासन या समाज करता है... लेकिन हर समय प्रशासन और समाज साथ नहीं रहते, उसके लिए व्यक्ति को खुद ही अपनी सुरक्षा करनी होती है... स्वयं, परिवार और संपति की सुरक्षा के लिए किसी हथियार की जरूरत होती है, लेकिन कोई भी धारदार हथियार या गन या किसी भी प्रकार का खतरनाक हथियार रखना कानून की नजर में जुर्म होता है... धारदार हथियार के अलावा प्रशासन गन रखने की अनुमति देता है, लेकिन उसके लिए हमें एक मजबूत कारण बताना पड़ता है... प्रशासन को बताना पड़ता है कि... हथियार की जरूरत क्यों है...?  तो आज के इस ब्लॉग में हम जानेंगे कि गन का लाइसेंस किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है...?  गन का लाइसेंस लेना मुश्किल जरूर है, लेकिन असंभव नहीं है...          जरूरी दस्तावेज पहचान पत्र (आ...

पॉवर ऑफ अटॉर्नी

 पॉवर ऑफ अटॉर्नी       कई बार हमें कुछ कामों की जरूरत पड़ती है और हम उन्हें कर पाने में सक्षम नहीं होते या अपना काम छोड़कर वह काम करना नहीं चाहते... या हम बीमार होते हैं और हमारे काम रुक जाते हैं तो... ऐसी स्थिति में हम अपने आप को असहाय महसूस करते हैं... ऐसा ही मामलों में काम आती है पावर ऑफ अटॉर्नी...  पावर ऑफ अटॉर्नी होती क्या है...? पावर ऑफ अटॉर्नी एक्ट 1882 के अनुसार एक ऐसा दस्तावेज होता है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अपना लीगल प्रतिनिधि नियुक्त करता है...!  जो घोषित करता है वो प्रिंसिपल कहलाता है और जो जिसको घोषित किया जाता है उसे एजेंट कहा जाता है...! एजेंट प्रिंसिपल के स्थान पर ज्यूडिशियल, फाइनेंशियल और अन्य फैसले ले सकता है... प्रिंसिपल के स्थान पर कोई डीड आदि साइन कर सकता है... ये सब कानूनन वैध होते हैं...! एजेंट पावर ऑफ अटॉर्नी के दायरे से बाहर नहीं जा सकता, यानी किसी मामले में मनमानी नहीं कर सकता... अगर एजेंट की वजह से प्रिंसिपल को कोई नुकसान हो जाता है तो उसकी भरपाई एजेंट ही करेगा, ये भी प्रावधान है...!  पावर ऑफ अटॉर्नी कैसे...

स्टे ऑर्डर कैसे लिया जाता है ?

स्टे ऑर्डर कैसे लिया जाता है ?    जीवन की अधिकतर समस्याएं बिना जानकारी के होती हैं, किसी भी बात की ठीक ठाक जानकारी हमें परेशानी में पड़ने से रोक सकती है... हर बात खुद के अनुभव से सीखी नहीं जाती, कई जानकारियां ऐसी होती हैं, जिनको किसी अन्य के अनुभव से ही सीखा जाना चाहिए... खुद के अनुभव से हम कोई काम निपटा नहीं सकते... व्यक्ति को हमेशा कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिए... कई शोध इस बात का दावा करते हैं कि हमेशा कुछ न कुछ नया करते रहने वाला व्यति ज्यादा उम्र पाता है... आज हम स्टे ऑर्डर पर जानकारी देंगे... जो भविष्य में आपके बहुत काम आ सकती है...! स्टे ऑर्डर होता क्या है...? जब कोई विरोधी पक्ष का व्यक्ति या पार्टी हमारे हितों के प्रतिकूल कोई कार्य करता है और उसको रोकने के लिए हमें प्रशासन की जरूरत होती है, प्रशासन का उस मामले में हस्तक्षेप सिविल कोर्ट के आदेश से ही संभव है... सिविल कोर्ट से उस कार्य को रूकवाने के लिए हमें कोर्ट के सामने एक एप्लीकेशन प्रस्तुत करनी होती है, जिसमें निवेदन करना होता कि विरोधी पक्ष हमारे हितों के विपरीत कार्य कर रहा है, जिसे रोकने के लिए स्टे ऑर्डर यानी निषेध...

चेक बाउंस होने पर क्या कर सकते हैं...?

चेक बाउंस होने पर क्या कर सकते हैं...?     आदमी को सबसे ज्यादा डर अगर किसी बात का है, तो वो है धोखा... मौत से अधिक डर व्यक्ति को धोखे से लगता है... धोखा मानसिक हो सकता है, आर्थिक मामले में हो सकता है... कई बार तो धोखा शारीरिक नुकसान भी पहुंचा देता है... इन सबसे बचने के लिए व्यक्ति को समाज के विषय में अपडेट रहना चाहिए...!  व्यक्ति को चाहिए कि अपने आस पास के माहौल को ठीक से समझ लें... ताकि आम जन की मानसिक स्थिति को लेकर कोई कोई कन्फ्यूजन नहीं रहे...!  आर्थिक मामलों में सबसे अधिक धोखे होते हैं, इनमें चेक से संबंधित धोखा सबसे ज्यादा होता है...! एक बार विश्वास करके चेक स्वीकार कर लिया जाए तो हम धोखा खाने से बच नहीं सकते हैं... हमें चेक लेते समय ये पता नहीं होता है कि चेक देने वाले के खाते में पैसे है भी या नहीं...? अगर चेक बाउंस हो जाए तो हमारे पास क्या क्या उपाय है, उसी पर हम आज जानेंगे...! चेक बाउंस होता कैसे है...? मान लीजिए आपको किसी ने किसी पेमेंट के बदले चेक काट कर दिया, आप उस चेक को बैंक में कैश करवाने या अपने खाते में पैसे डलवाने गए, जिसने चेक जारी किया है उसके खा...

उम्र कैद की सजा वास्तव में कितने साल की होती है...?

उम्र कैद की सजा वास्तव में कितने साल की होती है...?    जब कोई भ्रांति फैल जाती है तो वो बड़े व्यापक स्तर पर फैलती है... उसका जनमानस पर बहुत गहरा असर पड़ता है... गलत और तथ्यहीन बात बहुत जल्द फैल जाती है, ऐसे बातें लोगों को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है... फिर चाहे लाख कोशिश क्यों ना कर लीजिए... लोग गलत को ही सच मानेंगे...! ऐसी ही भ्रांति भारत में उम्रकैद की सजा को लेकर फैली हुई है... आम धारणा है कि उम्रकैद की सजा 14 साल ही होती है... जबकि ऐसा नहीं है..! मारू राम वर्सेज भारत सरकार के केस में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों के वकीलों की याचिका खारिज करते हुए कहा था कि उम्रकैद का मतलब मुजरिम को पूरी जिंदगी जेल में ही बितानी पड़ेगी... संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि उम्रकैद की सजा 14 साल है... उम्रकैद का मतलब जीवन भर जेल में ही रहना होगा... मारूराम और उसके साथी 1981 से हत्या के मामले में जेल में बंद हैं, और उनके वकीलों ने उनकी जेल में बिताई गई 14 वर्ष की अवधि के बाद उनको रिहा करने के लिए एक याचिका दायर की थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया...! IPC के सेक्शन 45 में ये उल्लेख किया ...

दीवानी मुकदमा या सिविल केस कैसे किया जाता है...?

दीवानी मुकदमा या सिविल केस कैसे किया जाता है...?        काम करने के अपने अपने तरीके होते हैं, किसी भी काम को अगर ठीक तरीके से किया जाए तो, उस काम के सफल होने की संभावनाएं बढ़ जाती है, अगर ठीक प्रोसीजर से कोई काम किया जाए तो आधी समस्याएं तो वैसे ही सुलझ जातीं है...! कोर्ट के मामलों में काम अपनी एक प्रक्रिया से होता है... प्रक्रिया पर ही निर्भर है कि बात किस स्तर तक जा सकती है, प्रक्रिया अगर ठीक है तो आप बिना समस्याओं का सामना किए... अपनी मंजिल पा सकते हैं...!  आज हम सिविल केस यानी दीवानी मुकदमा दायर कैसे किया जाए, उसके विषय में जानेंगे...! Civil Case या दीवानी मुकदमा   ऐसी स्थिति में किया जाता है, जब हमारा उद्देश्य अपना अधिकार प्राप्त करने का हो, ऐसे मामलों में जेल नहीं होती... इनमें तलाकशुदा महिला को अपना गुजारा भत्ता प्राप्त करना हो, किसी पर मानहानि का मुकदमा करके हर्जाना लेना हो... आदि मामले आते हैं, इनका उद्देश्य जेल भिजवाना नहीं होता...  Civil Case या दीवानी मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है, कोर्ट का प्रोसीजर फॉलो करना... प्रोसीजर का पाल...

वसीयत

वसीयत           भविष्य में आने वाली अधिकतर समस्याओं को हम अपनी सूझ बूझ से टाल सकते हैं... जिस परिवार में जितनी कम समस्या आयेगी... वो परिवार उतना ही अधिक उन्नति करेगा... समस्याओं से घिरा परिवार और उस परिवार के सदस्य कभी उन्नति नहीं कर सकते...!    समस्याओं से घिरा परिवार हमेशा सबसे पीछे ही रहता है... ना बच्चे पढ़ पाते हैं, ना उनको उचित संस्कार मिल पाते हैं... इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि आप समाज में चल रही समस्याओं को पर नजर रखे, उनका विश्लेषण करते रहें... और उस अनुभव के आधार पर आप अपने परिवार के भविष्य में आने वाली समस्याओं से बच सकते हैं... अगर आपका परिवार बहुत बड़ा है, तो समस्याएं भी ज्यादा आने वाली हैं...! ज्यादातर समस्याएं संपत्ति को लेकर होती हैं... संपत्ति का बंटवारा ठीक से नहीं हुआ है, तो समस्याओं का अंबार लग जाता है, इस समस्या से परिवार टूट जाता है... इसको टालने के लिए आपको अपनी संपत्ति को लेकर समय पर वसीयत तैयार करवा लेनी चाहिए...!  वसीयत वसीयत स्टांप या सादे कागज पर करवाई जा सकती है... दोनों की मान्यता बराबर है... विवाद ना हो इसलिए...

किरायेदार से अपनी दुकान या अपना मकान कैसे खाली करवा सकते हैं...?

किरायेदार से अपनी दुकान या अपना मकान कैसे खाली करवा सकते हैं...?        एक परिवार या व्यक्ति के लिए आजीविका जीवन का आधार होती है... आजीविका का अर्थ है... आय का श्रोत, जहां से आपके घर में धन आता है, जिससे आप अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं... ये सरकारी नौकरी या खुद का व्यवसाय हो सकता है... कोई बेरोजगार होता है या आजीविका का स्थाई साधन नहीं होता, ऐसी स्थिति में धन की आवश्यकता रहती है, लेकिन आजीविका स्थाई नहीं होती... तब हमारे पास अपनी संपति होती है... जिसे या तो हम बेच सकते हैं या फिर उसे रेंट यानी किराए पर दे सकते हैं... किराए पर देने का विकल्प सबसे बेहतर होता है... इसमें किसी जरूरतमंद को रहने के लिए घर मिल सकता है या आपके पास कोई दुकान है तो अपनी दुकान चला सकता है... उसकी रहने या व्यवसाय की आवश्यकता पूरी हो जाती है, और उसके माध्यम से आपको धन  की...  लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हम अपना घर या दुकान विश्वास करके किराए पर दे तो देते हैं लेकिन उस संपति को हमारे जरूरत पड़ने पर किरायेदार खाली करनें से मना कर देता है... या फिर दुर्व्यवहार करने पर उतारू हो जाता है....

संपति पर अवैध कब्जा हो जाने पर कैसे खाली करवाएं...?

संपति पर अवैध कब्जा हो जाने पर कैसे खाली करवाएं...?      समस्याएंं जीवन का हिस्सा हैं, आती रहती है... एक समस्या का निदान हुआ नहीं कि दूसरी समस्या उपस्थित हो जाती है... दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिंदगी का दूसरा नाम ही समस्या है... व्यक्ति अपने अनुभवों से ही सीखता है... ज्यादा अनुभवी व्यक्ति के पास ज्यादा समस्याओं का समाधान होता है... जैसे जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, वैसे ही उसे जीवन का अधिक अनुभव होता जाता है... ज्यादा उम्रदराज व्यक्ति मतलब ज्यादा समझदार और अनुभव... अनुभव ही व्यक्ति की जीवन भर की संपति होती है...  व्यक्ति के पास संपति है लेकिन अनुभव नहीं है तो संपति ज्यादा समय तक नहीं टिकेगी...! शायद हम अपने से उम्र में बड़े या बुजुर्गों का इसी लिए सम्मान करते हैं, क्योंकि उनके पास हमसे ज्यादा अनुभव है, वे हमसे ज्यादा समझदार हैं... वो किसी भी समस्या का हमसे जल्दी समाधान निकाल सकते हैं, उनकी किसी सलाह से जीवन की बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है...! अपने से अनुभवी व्यक्ति का हमेशा सम्मान करना चाहिए, ताकि हम उनके सानिध्य में रहकर उनके अनुभव से सीख सकें...! हम...